*प्रेस विज्ञप्ति **29 **सितंबर,*
*2016 **दिल्ली*

*कैराना पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट- पूर्वाग्रह और पक्षपातपूर्ण
रवैया*

*राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा अपराधी बताए जाने पर कैराना में रह रहे
मुज़फ़्फ़रनगर दंगे से प्रभावित लोगों की नाराज़गी*

*राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से माफ़ी माँगने और रिपोर्ट वापस लेने की माँग*

21 सितंबर 2016 को जारी अपनी एक प्रेस विज्ञप्ति में राष्ट्रीय मानवाधिकार
आयोग ने अपनी एक जाँच और उसके निष्कर्षों के हवाले से यह दावा किया है कि
शामली ज़िले (उ.प्र.) के कैराना क़स्बे में कुछ परिवारों को कथित तौर पर ‘पलायन
’ करने के लिए मजबूर होना पड़ा, उसकी बड़ी वजह यह है कि उस इलाक़े में अपराध
में अचानक से वृद्धि हो गई है। हम लोग इससे बहुत हैरान और दुखी हैं। यह
रिपोर्ट जिस प्रकार के तथ्यों पर आधारित है वह संदेह के घेरे में है। और इससे
पूर्वग्रह और साम्प्रदायिता से ग्रसित धारणा को बल मिलता है। जिन दंगा
पीड़ितों की सुरक्षा की जानी थी, उन पर आरोप लगाया जा रहा है।

इसलिए हम राष्ट्रीय मानवाधिकार से माँग करते हैं कि वह अपने इन  ‘निष्कर्षों’  के
समर्थम में प्रमाण दे, और अगर वो ऐसा करने में नाकाम होती है तो वह माफ़ी
माँगे और पूर्वाग्रहपूर्ण रिपोर्ट वापस ले। जिस रिपोर्ट द्वारा पूरे समुदाय पर
एक आरोप मढ़ा गया और उसकी छवि ख़राब करने की कोशिश की गई।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी जाँच के निष्कर्षों को प्रेस विज्ञप्ति में
बिंदुवार शामिल किया है, बिंदु संख्या 12 में कहा गया है-

“कम से कम 24 चश्मदीद गवाहों ने बताया कि कैराना शहर में एक ख़ास बहुसंख्यक
समुदाय (मुसलमान) के नौजवान एक ख़ास अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों के ख़िलाफ़
भद्दी/अपमानजनक टिप्पणी करते थे। इस वजह से कैराना शहर में एक ख़ास अल्पसंख्यक
समुदाय (हिन्दू) की लड़कियाँ बाहर आने जाने से परहेज़ करने लगीं। बावजूद इसके
ये इतनी हिम्मत नहीं जुटा सकीं कि वे पुलीस से इन घटनाओं की शिकायतकर सकें
ताकि इसके ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई हो सके।”

बिंदु 18 में कहा गया है-

“2013 में पनर्वास के बाद के परिदृश्य में मुस्लिम समुदाय के लगभग 25/30 हज़ार
लोग मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले (उ.प्र) से आकर कैराना शहर में बस गए। इससे कैराना
शहर का जनसांखिकी अनुपात मुस्लिम समुदाय के पक्ष में बदल गया, इससे यह समुदाय
और भी शक्तिशाली और बहुसंख्यक हो गया। जिन जश्मदीदों से बात की गई वे और बहुत
से पीड़ित इस बात को महसूस करते हैं कि 2013 में इन लोगों के यहाँ बस जाने की
वजह से कैराना शहर की सामाजिक स्थिति हमेशा के लिए बदल गई, इसकी वजह से
क़ानून-व्यवस्था की स्थिति और भी बिगड़ गई।”

1.      बिना किसी विश्वसनीय और स्वतंत्र साक्ष्य के इन बेबस दंगा पीड़ितों पर
अपराधिक आरोप लगाना राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी संस्था को शोभा नहीं देता।
पहली चीज़, कैराना शहर में 25-30,000 मुसलमानों के बसने की बात कही गई है, हम
इस संदर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से तथ्यपूर्ण साक्ष्य की मांग करते
हैं। मुज़फ़्फ़रनगर में 2013 में हुई साम्प्रदायिक हिंसा की वजह से प्रारंभिक
तौर पर 75,000 लोग विस्थापित हुए थे। 2016 में आई एक रिपोर्ट-*सिमटती ज़िंदगीः
साम्प्रदायिक हिंसा और जबरन विस्थापन, मुज़फ़्फ़रनगर और शामली के हालात- *जो
व्यापक शोध पर आधारित है, जिसमें यह पाया गया कि लगभग 50,000 ऐसे लोग हैं आज
भी मुज़फ़्फ़रनगर, शामली और दूसरे ज़िलों में यहाँ वहाँ आबाद हैं। इनमें से
लगभग 30,000 आंतरिक रूप से विस्थापित पीड़ित लोग पुनर्वास कॉलोनियों में आबाद
हो गए हैं, जो अब कभी अपने घर नहीं लौट सकेंगे। जिन्हें अपने परिजनों के खोने
के साथ साथ, अपने घर, इतिहास, स्कूल, दोस्त, रोज़गार और पड़ोसी खोने का दुख है
और वे इस दुख और पीड़ा के साथ जी रहे हैं। इनमें से 270 परिवार (लगभग 2000
लोग) कैराना शहर में बसे हैं। भारत के नागरिक के तौर पर इन्हें ऐसा करने का
पूरा हक़ है। ये लोग राज्य और देश के नागरिकों की सहानुभूति और सहायता के
हक़दार हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी मानवाधिकार संस्था से ये इस बात
की आशा करते हैं कि वे इनके पुनर्वास में इनकी सहायता करें। साम्प्रदायिक घृणा
की वजह से इन लोगों को अपना शहर और गाँव छोड़ना पड़ा जहाँ ये लोग पैदा हुए। यह
अपने आप में बहुद दुखद है। इनकी मदद करने के बजाय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
की रिपोर्ट इनके ऊपर ‘अपराधी’ का लेबल लगा देती है या ऐसे समूह के रूप में
प्रस्तुत करती है जिसकी वजह से “कानून-व्यवस्था की स्थिति और बिगड़ गई है”। यह
उनके प्रति दोहरा अन्याय है। कैराना शहर पहले से ही मुस्लिम बहुल शहर रहा है
सिर्फ़ 2,000 दंगा पीड़ितों की वृद्धि हो जाने से इनका “और अधिक प्रभुत्व”
नहीं बढ़ जाता।





2.      संभव है कि बिगड़ती क़ानून व्यवस्था या अपराध की वजह से कुछ लोग पलायन
करने के लिए मजबूर हुए हों, और अगर ऐसा है भी, तो यह राज्य सरकार की
ज़िम्मेदारी है कि वह कार्रवाई करे। अपारध का कोई धर्म या समुदाय नहीं होता।
जो लोग ख़ुद 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में हुई साम्प्रदायिक हिंसा से पीड़ित हैं
उन्हें कैराना शहर में कथित क़ानून-व्यवस्था की समस्या के लिए ज़िम्मेदार ठहरा
कर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस घटना का साम्प्रदायीकरण कर रही है। उसका यह
प्रयास निन्दनीय है। हमारी प्रतिष्ठित मानवाधिकार संस्था अपने सार्वजनिक
रिपोर्ट में इतनी लापरवाही और ग़ैरज़िम्मेदारी के साथ अपनी बात रखती है, कुछ
अनाम चश्मदीदों के आधार पर कहती है कि वह ऐसा “महसूस करती है” और भारतीय
नागरिकों के एक पूरे समुदाय पर अपराधी का लेबल लगा कर उसे लांछित करती है। यह
अपने में गंभीर चिंता का विषय है। इस तरह से विकृत बयानबाज़ी का आख़िर क्या
आधार है?



3.      हम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से इस बात की सफ़ाई भी माँग रहे हैं कि
ऐसे निराधार विषय की उसने जाँच क्यों की। उसने यह फ़ैसला क्यों किया कि वह एक
राजनीतिक पार्टी द्वारा भेजी गई 346 परिवारों की सूची का अध्ययन करेगी। जबकि
वह पार्टी उत्तरप्रदेश चुनाव से पहले साम्प्रदायिक माहौल बनाना चाहती है। कुछ
विश्वसनीय अख़बार की जाँच के बाद ये सूची झूठी साबित हो चुकी है। द हिन्दू की
एक रिपोर्ट (17 जून, 2016) बताती है, [कैराना से भाजपा सांसद] श्री [हुकुम]
सिंह ने जिन 346 परिवारों की सूची प्रस्तुत की, उनमें से 119 की जाँच के बाद
शामली प्रशासन ने पाया कि इनमें से 68 रोज़गार, व्यापार, बच्चों की पढ़ाई,
स्वास्थ और दूसरी सुविधाओं की तलाश में 10-15 साल पहले कैराना छोड़कर चले गए।
इस सूची में से चार लोग मर चुके हैं। जबकि 13 परिवार अभी भी कैराना में रह रहे
हैं।” इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट  (16 जून, 2016) बताती है, “भाजपा की ‘
हिन्दुओं’ के जबरन पलायन वाली सूची में वे भी शामिल हैं जो मर चुके हैं या
बेहतर रोज़गार की तलाश में पलायन कर गए।” फिर भी, इस बेबुनियाद विषय को इतना
महत्वपूर्ण समझा गया कि इसकी जाँच चार सदस्यीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग करे।



4.      इस देश के नागरिकों के साथ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने साफ़ तौर पर
जो दोहरा रवैया अपनाया है हम उससे बहुत विचलित हैं। 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर
में हुई साम्प्रदायिक हिंसा की वजह से बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। हिंसा,
हत्या, बलात्कार और आगज़नी की वजह से 75,000 से ज़्यादा लोगों को अपने
जन्मस्थान को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। फिर भी राष्ट्रीय मानवाधिकार
आयोग ने किसी तरह की जाँच या कार्रवाई करना ज़रूरी नहीं समझा। 350 से भी कम
लोगों के कथित “पलायन” को लेकर आयोग ने कई सिफ़ारिशें दी हैं, उनमें से एक
सिफ़ारिश यह हैः



“ उत्तरप्रदेश सरकार को एक उच्च स्तरीय समिति गठित करनी चाहिए *जो कैराना शहर
से विस्थापित सभी परिवारों से मिले*, जो अब उत्तराखंड तथा हरियाणा के
देहरादून, पानीपत, मुज़फ़फ़रनगर, रूरकी, करनाल आदि ज़िले में रह रहे हैं। यह
समिति उनकी शिकायतों का निवारण करे और जो लोगों वापस कैराना आना चाहते हैं,
उनकी सहायता करे।”

हम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से यह पूछना चाहते हैं कि 2013 में
मुज़फ़्फ़रनगर में हुई साम्प्रदायिक हिंसा की वजह से लगभग 75,000 नागरिक
विस्थापित हुए उनके पुनर्वास को सुनिश्चित करने के लिए आयोग ने क्या किया।
क्या कभी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसी तरह की कोई उच्च स्तरीय समिति गठित
करने का प्रस्ताव किया जो *“**उन सभी विस्थापित परिवारों से मिले*”, उनकी
शिकायतों का निवारण करें और उनकी घर वापसी में मदद करे?



5.      हम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से यह भी पूछना चाहते हैं कि उसने किस
आधार पर साम्प्रदायिक रूप से रूढ़ और अफ़वाहग्रस्त हो चुकी चेड़खानी की घटना
को एक समुदाय विशेष के साथ जोड़ कर उसे वैधता प्रदान की। इससे ‘हिन्दू समाज की
इज़्ज़त’ की वायवीय धारणा को बल मिलता है, जिसका इस्तेमाल साम्प्रदायिक हिंसा
से सम्बद्ध पुरानी घटनाओं में किया जाता रहा है। बिजनौर की घटना इसका ताज़ा
उदाहरण है। अगर फिर भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यह सोचती है कि मानवाधिकार
से सम्बद्ध एक वैधानिक संस्था के बयान देने के लिए यह एक उचित विषय है, तो
उसको अपना निष्कर्षात्मक बयान देते समय वास्तविक अपराधिक रिकार्ड को ध्यान में
रखना चाहिए।









*हम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से यह माँग करते हैः*

1.      वह इस अपमानजनक और झूठी ‘जाँच’ रिपोर्ट को वापस ले।

2.      भारत की वैधानिक मानवाधिकार संस्था ने 2013 की मुज़फ्फ़रनगर
साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों का अपमान किया है, जो बहुत मुश्किल हालात
में अपनी ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं, जिनमें से कुछ कैराना शहर में भी रह रहे
हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को अपने इस कृत्य के लिए उनसे माफ़ी माँगनी
चाहिए।

3.      कैराना में उनकी सुरक्षा की निगरानी करे।







इनके द्वारा यह प्रेस विज्ञप्ति जारी किया गयाः


*कैराना में रह रहे मुज़फ्फ़रनगर साम्प्रदायिक हिंसा से प्रभावित लोग हर्ष
मंदर, अमन बिरादरी (दिल्ली)**; *

*अकरम चौधरी, अफ़कार इंडिया (शामली) माधवी कुकरेजा और ममता वर्मा, सद्भावना
ट्रस्ट (लखनऊ) फ़राह नक़वी, स्वतंत्र लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता (दिल्ली) *

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